लोक अदालत क्या है? क्या मेरा केस वहाँ निपट सकता है?
सीधा जवाब
हाँ, अगर दोनों पक्ष राज़ी हों। लोक अदालत विधिक सेवा प्राधिकरण का मुफ्त समझौता मंच है। इसका अवॉर्ड कोर्ट की डिक्री जैसा होता है, अपील नहीं होती, और भरी कोर्ट फीस वापस मिलती है। जिन अपराधों में कानूनी समझौता नहीं हो सकता, वे यहाँ नहीं आते।
असल ज़िंदगी के उदाहरण
सविता का एक सप्लायर के खिलाफ पैसे की वसूली का केस तीन साल से चल रहा है। राष्ट्रीय लोक अदालत में दोनों किस्तों में भुगतान पर राज़ी हो जाते हैं। अवॉर्ड डिक्री की तरह अंतिम हो जाता है और सविता को कोर्ट फीस वापस मिलती है।
लोक अदालत में कविता का पड़ोसी हर समझौते से मना कर देता है। उसे कोई मजबूर नहीं कर सकता। कविता का केस वापस नियमित कोर्ट में जाता है और जहाँ रुका था वहीं से आगे चलता है।
तेनज़िन को बहुत बढ़ा हुआ बिजली का बिल आया। वह स्थायी लोक अदालत में आवेदन करता है। बिजली कंपनी से बातचीत नाकाम होने पर स्थायी लोक अदालत खुद फैसला करती है, और उसका अवॉर्ड बाध्यकारी होता है।
आपको क्या करना चाहिए?
- 1चल रहे केस के लिए अपने वकील या कोर्ट से कहें कि उसे अगली लोक अदालत में भेजा जाए।
- 2जो विवाद अभी कोर्ट में नहीं है, उसके लिए DLSA या तालुका विधिक सेवा समिति में प्री-लिटिगेशन (मुकदमे से पहले) सुनवाई के लिए आवेदन करें।
- 3अगली राष्ट्रीय लोक अदालत की तारीख अपने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की वेबसाइट पर देखें, या 15100 पर कॉल करें।
- 4तय तारीख पर पहचान पत्र और केस के कागज़ लेकर जाएँ। सिर्फ वही शर्तें मानें जिन्हें आप सच में निभा सकें।
- 5दस्तखत से पहले समझौता ध्यान से पढ़ें। अवॉर्ड पास होने के बाद वह अंतिम होता है।
- 6बिजली, पानी, परिवहन, टेलीफोन, अस्पताल या बीमा जैसी जन-उपयोगी सेवाओं के विवाद के लिए स्थायी लोक अदालत में आवेदन करें।
अपवाद और ज़रूरी बातें
- जिन अपराधों में कानून समझौते की अनुमति नहीं देता (अशमनीय), जैसे हत्या या बलात्कार, उनका लोक अदालत में निपटारा नहीं हो सकता।
- आम लोक अदालत दोनों पक्षों की सहमति के बिना फैसला नहीं कर सकती। सिर्फ स्थायी लोक अदालत गुण-दोष पर फैसला कर सकती है, और वह भी ₹1 करोड़ तक के मामलों में।
- अवॉर्ड के खिलाफ अपील नहीं होती। इसे सिर्फ बहुत सीमित आधारों, जैसे धोखाधड़ी, पर हाई कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
आधिकारिक कानूनी संदर्भ
Legal Services Authorities Act, 1987 — Section 19
विधिक सेवा प्राधिकरण चल रहे और मुकदमे से पहले के विवादों के लिए लोक अदालत लगाते हैं; अशमनीय अपराध इसमें नहीं आते।
Legal Services Authorities Act, 1987 — Section 20
पक्ष राज़ी हों या समझौता संभव लगे तो कोर्ट केस भेजती है; समझौता न हो तो केस वापस कोर्ट में जाता है।
Legal Services Authorities Act, 1987 — Section 21
अवॉर्ड को सिविल कोर्ट की डिक्री माना जाता है, यह अंतिम और बाध्यकारी है, अपील नहीं होती, और कोर्ट फीस वापस मिलती है।
Legal Services Authorities Act, 1987 — Sections 22A–22E
जन-उपयोगी सेवाओं के लिए स्थायी लोक अदालत, समझौता न होने पर ₹1 करोड़ तक के विवाद खुद तय कर सकती है, पर अपराध नहीं।
मदद कहाँ मिलेगी
स्रोत और स्थिति
- कहाँ लागू
- पूरे भारत में
- कानून लागू होने की तारीख
- 9 नव॰ 1995
- कानूनी समीक्षा
- ड्राफ्ट — वकील की समीक्षा बाकी
यह शैक्षिक जानकारी है, आपके केस के लिए कानूनी सलाह नहीं। सही तथ्य और लागू कानून मायने रखते हैं — कोई कदम उठाने से पहले वकील से बात करें।
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