कंपनी कहती है कि बॉन्ड की रकम दो या पूरा नोटिस पीरियड करो। क्या यह लागू हो सकता है?
सीधा जवाब
कुछ हद तक। न्यूनतम सेवा वाला बॉन्ड वैध हो सकता है, लेकिन कंपनी आमतौर पर सिर्फ उचित मुआवज़ा (जैसे असली ट्रेनिंग खर्च) ही वसूल सकती है, कोई भी मनमानी रकम नहीं। नोटिस पीरियड कॉन्ट्रैक्ट के हिसाब से है। नौकरी छोड़ने के बाद प्रतियोगी कंपनी में जाने पर रोक आमतौर पर अमान्य है।
असल ज़िंदगी के उदाहरण
चेन्नई में 3 महीने की पेड ट्रेनिंग के बाद विक्रम ने ₹2 लाख जुर्माने वाला 2 साल का बॉन्ड साइन किया। वह 10 महीने बाद नौकरी छोड़ता है। कोर्ट कंपनी को उसके असली नुकसान से जुड़ी उचित रकम दिला सकता है, अपने-आप पूरे ₹2 लाख नहीं।
2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक सरकारी बैंक की उस शर्त को सही माना जिसमें सीनियर मैनेजर को 3 साल से पहले नौकरी छोड़ने पर ₹2 लाख देने थे। कोर्ट ने रकम को उचित माना और इसे व्यापार पर रोक नहीं माना। यानी बॉन्ड अपने-आप गैरकानूनी नहीं होते।
रुख़साना के कॉन्ट्रैक्ट में लिखा है कि नौकरी छोड़ने के 2 साल तक वह किसी प्रतियोगी कंपनी में नहीं जा सकती। धारा 27 के तहत ऐसी रोक आमतौर पर अमान्य है, इसलिए वह नई नौकरी ले सकती है, पर कंपनी के गोपनीय राज़ उसे गोपनीय रखने होंगे।
आपको क्या करना चाहिए?
- 1अपना अपॉइंटमेंट लेटर और बॉन्ड पढ़ें: रकम, अवधि, और क्या नोटिस पीरियड पैसे देकर खत्म किया जा सकता है।
- 2माँगी गई किसी भी रकम का लिखित ब्योरा HR से माँगें, जैसे असली ट्रेनिंग खर्च।
- 3कॉन्ट्रैक्ट में नोटिस बायआउट की इजाज़त हो तो लिखित में पेशकश करें, या पॉलिसी अनुमति दे तो छुट्टियाँ एडजस्ट करने को कहें।
- 4ओरिजिनल सर्टिफिकेट ज़मानत के तौर पर न दें। अगर रोक लिए गए हैं, तो लिखित में वापस माँगें और कानूनी मदद लें।
- 5कंपनी डिमांड नोटिस भेजे तो वकील से जवाब दिलवाएँ। आखिरी रकम सिर्फ कोर्ट तय कर सकता है।
अपवाद और ज़रूरी बातें
- कोर्ट आमतौर पर आपको काम जारी रखने के लिए मजबूर नहीं करेगा, लेकिन नोटिस की शर्त तोड़ने पर कंपनी नुकसान के लिए केस कर सकती है।
- नौकरी के दौरान लगी रोक, जैसे नौकरी में रहते हुए प्रतियोगी के लिए काम न करना, आमतौर पर वैध होती है।
आधिकारिक कानूनी संदर्भ
Indian Contract Act, 1872 — Section 27
किसी को वैध पेशा, व्यापार या कारोबार करने से रोकने वाला समझौता अमान्य है (गुडविल बेचने पर सीमित छूट)।
Indian Contract Act, 1872 — Section 74
कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने पर तय रकम या जुर्माना लिखा हो, तब भी कोर्ट उस रकम तक सिर्फ उचित मुआवज़ा दिलाता है।
Niranjan Shankar Golikari v. Century Spinning and Manufacturing Co. (1967)
सुप्रीम कोर्ट: सिर्फ नौकरी की अवधि के दौरान लागू रोक आमतौर पर व्यापार पर रोक नहीं मानी जाती।
Vijaya Bank v. Prashant B. Narnaware (2025)
सुप्रीम कोर्ट ने जल्दी इस्तीफ़े पर ₹2 लाख वाले न्यूनतम सेवा बॉन्ड को उचित माना; यह व्यापार पर रोक या सार्वजनिक नीति के खिलाफ नहीं।
मदद कहाँ मिलेगी
स्रोत और स्थिति
- कहाँ लागू
- पूरे भारत में
- कानून लागू होने की तारीख
- 1 सित॰ 1872
- कानूनी समीक्षा
- ड्राफ्ट — वकील की समीक्षा बाकी
यह शैक्षिक जानकारी है, आपके केस के लिए कानूनी सलाह नहीं। सही तथ्य और लागू कानून मायने रखते हैं — कोई कदम उठाने से पहले वकील से बात करें।